‘आज भी गीतों में ज़िंदा है उर्दू’

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इंदु पांडेय

कहते हैं दिल की बात वहां तक पहुँचती है, जहाँ फ़रिश्ते भी नहीं पहुँच पाते.
बॉलीवुड का हीरो अपने दिल की बात कहने के लिए अक्सर गीतकार के शब्दों का सहारा लेता है.
ये कई बार होता है कि लोग फ़िल्म का नाम भूल जाते हैं लेकिन उसके गाने उनकी ज़बान पर रहते हैं.
कुछ गाने जिसका कोई लफ्ज़ अगर समझ में नहीं आ रहा तो उसका अंदाज़ा लगा लेते हैं. या, फिर गूगल की शरण मे जाकर देख लिया जाता है.
हालांकि आजकल सिनेमा में वही तैयार हो रहा है जो बिक रहा है.
गीतकार इरशाद कामिल भी इससे सहमति जताते हैं, “हमें डिमांड के हिसाब से लिखना होता है. ज़बान और ख़्याल को एक साथ लाना फ़िल्मों में एक चैलेंज है.”
वे कहते हैं, “सही ज़बान कानों में घुल जाती है. लेकिन कई अच्छे गाने आए और चले गए किसी ने उनकी ख़ैरियत तक नहीं पूछी.”
इरशाद का कहना है, “सिनेमा लॉटरी की तरह हो गया है. फ़िल्में हिट तो पैसे मिलते है नहीं तो उसके साथ साथ फ़िल्म और गाने दोनों मर जाते हैं. फ़िल्मों की ज़बान उर्दू नहीं रही क्योंकि समाज की ज़बान उर्दू नहीं है.”
उन्होंने कहा, “दर्शक जो सुन रहा है वही गीतकार लिख रहा है. आज ‘शीला की जवानी’, ‘मुन्नी बदनाम’, ‘तूने मारी एंट्री’ जैसे गाने सुनाई देते हैं, यानी जो फ़टाफ़ट हिट हो वही चलेगा.”
इन गानों को आप कहीं से भी शुरू कर के कहीं से भी काट सकते हैं. अच्छा गाना सुनने के लिए इत्मिनान की ज़रूरत होती है.
कई शब्दों की मायने जो कई बार समझ नहीं आकर भी समझ में आ जाते हैं.
हिंदी फ़िल्मों ने बहुत से दौर देखे हैं पर आज का दौर बदलाव का दौर है.
सिनेमा शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि तस्वीरों वाला माध्यम है. बॉलीवुड में बंबईया भाषा है, उर्दू नहीं पर हिंदी फ़िल्मों के गानों में उर्दू ज़रूर है.
लोग फ़िल्म भूल जाते हैं पर गाने याद रहते हैं. पहले के कई गीतकार शायर थे आज के ज़्यादातर गीतकार शायर नहीं सिर्फ़ गीतकार हैं.
अच्छा आज भी लिखा जा रहा हैं पर अच्छा सुनने वाला श्रोता कहीं गुम हो गया है.
कभी दाग़ ने कहा था, “उर्दू है जिसका नाम, हमीं जानते हैं दाग़, सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है.”
पर आजकल मामला सिर्फ़ ‘धूम धूम’ का रह गया है.

Citation
Indu Pandey, “‘आज भी गीतों में ज़िंदा है उर्दू’,” in BBC Hindi, March 18, 2015. Accessed on March 21, 2015, at: http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2015/03/150316_rekhta_urdu_ip

Disclaimer
The item above written by Indu Pandey and published in BBC Hindi on March 18, 2015, is catalogued here in full by Faiz-e-Zabaan for non-profit educational purpose only. Faiz-e-Zabaan neither claims the ownership nor the authorship of this item. The link to the original source accessed on March 21, 2015, is available here. Faiz-e-Zabaan is not responsible for the content of the external websites.

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