एक शख़्स के इर्द-गिर्द घूमती ‘जासूसी दुनिया’

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अशोक कुमार

उर्दू का ज़िक्र छिड़ते ही बहुत से लोगों के ज़ेहन में दो-चार शेर गर्दिश करने लगते हैं, लेकिन सस्पेंस और थ्रिलर के शौकीन इस ज़ुबान के ज़रिए जासूसी की दुनिया में ग़ोते खाते रहे हैं.

दिलचस्प बात ये है कि इस दुनिया के किरदार न किसी ने टीवी पर देखे हैं, ना सिनेमा के पर्दे पर. एनिमेशन की दुनिया तक पहुंचना तो उनके लिए और दूर की बात लगती है.
ये किरदार बस सालों-साल से भारत और पाकिस्तान में काग़ज़ के पन्नों से पढ़ने वालों के दिलो-दिमाग़ पर उतरते रहे हैं.
इन किरदारों को रचने वालों में सबसे बड़ा नाम है इब्ने सफ़ी. उर्दू में जासूसी अदब लिखने वाले नाम तो कई और भी है, लेकिन इस बात पर ज़्यादातर लोग सहमत हैं कि इसे बुलंदी बख़्शने वाले शख़्स इब्ने सफ़ी ही हैं.
उर्दू साहित्य में जब भी जासूसी विधा की बात चलती है, उसे सिर्फ़ इब्ने सफ़ी पर ही केंद्रित होने से बचा पाना निहायत ही मुश्किल काम है.
इब्ने सफ़ी पर शोध करने वाले और जामिया मिलिया इस्लामिया में उर्दू के रीडर ख़ालिद जावेद इस बात की तस्दीक़ करते हैं.
वो कहते हैं, “जैसे कहा जाता है कि ग़ालिब के बाद उर्दू में जितनी भी क्लासिकी ग़ज़ल थी, वो आगे नहीं बढ़ पाई. इसी तरह उर्दू का ख़ालिस जासूसी नॉवेल इब्ने सफ़ी से इब्ने सफ़ी तक ही महदूद रहा. इसे मैं बहुत अच्छी बात नहीं मानता हूं. लेकिन इससे इब्ने सफ़ी की महानता ज़रूर बयां होती है.”
इब्ने सफ़ी ने 120 उपन्यासों वाली ‘जासूसी दुनिया’ सीरीज़ लिखी. इसके अलावा उनके 125 उपन्यास इमरान सिरीज़ के है. उनके लगभग सभी उपन्यासों को आप ‘बेस्ट सेलर’ का तमग़ा दे सकते हैं.
हर महीने उनका नया उपन्यास बाज़ार में आता था और पाकिस्तान और भारत, दोनों जगह हाथों-हाथ बिक जाता था. बताते हैं कि पायरेसी और ब्लैक मार्केटिंग होती थी, वो अलग.
हिंदी के अलावा तेलुगु और बांग्ला समेत कई भारतीय भाषाओं में उनके उपन्यासों का नियमित रूप से अनुवाद होता था.
खालिद जावेद तो यहां तक कहते हैं, “लोग तब दूसरे लेखकों के जासूसी नॉवेल पढ़ते थे, जब इब्ने सफ़ी का नॉवेल नहीं आता था.”
इब्ने सफ़ी ने अपने जासूसी उपन्यासों का सफर 1952 में शुरू किया. लेकिन उर्दू में पहला जासूसी उपन्यास 1916 में जफ़र उमर का छपा ‘नीली छतरी’ माना जाता था जो एक यूरोपीय उपन्यास का अनुवाद था.
इसकी कामयाबी से प्रभावित होकर मुंशी तीरथराम फिरोज़पुरी ने पश्चिम के कई उपन्यासों को उर्दू के पाठकों तक पहुंचाया और उन्हें इसका चस्का भी लग गया.
इसके बाद 1952 में इब्ने सफ़ी ने अपना पहला जासूसी उपन्यास ‘दिलेर मुजरिम’ लिखा, हालाँकि यह भी एक अंग्रेज़ी उपन्यास का अनुवाद था. लेकिन जल्द ही वो मौलिक उपन्यास रचने लगे. फरीद, हमीद, एक्स-2, जूलिया, सफ़दर क़ासिम, फय्याज़ और सुलेमान जैसे किरदार उनकी मौलिकता और रचनात्मकता उभारते हैं.
लेकिन उनका सबसे लोकप्रिय किरदार इमरान है, जिसकी दोहरी शख़ियत पढ़ने वालों को बहुत लुभाती है. एक तरफ़ तो वो अपने काल्पनिक देश की ख़ुफ़िया एजेंसी का प्रमुख है तो दूसरी तरफ एक मस्तमौला आदमी. लोग समझते है कि वो ज़रा भी गंभीर व्यक्ति नहीं है. वो एक्शन करता है, तो हंसी-ठिठोली भी.
इब्ने सफ़ी के रहते और उनके जाने के बाद इमरान के किरदार पर मज़हर कलीम एमए, इब्ने राहत, मुश्ताक अहमद कुरैशी, एच इक़बाल, आयने सफ़ी, एमए राहत, एम राहत और ए सफ़ी जैसे कई लेखकों ने उपन्यास लिखे, लेकिन जो बात पढ़ने वालों को शायद इब्ने सफ़ी के यहां मिलती है, वो कहीं और नहीं.
यहां एक सवाल यह उठता है कि इस क़दर बांधने वाली कहानी और दिलचस्प किरदार किताबों में ही क्यों क़ैद हैं?.
टीवी और सिनेमा न सिर्फ़ इस साहित्यिक पूंजी को संजोने का साधन हो सकते है, बल्कि इनके ज़रिए आज की पीढ़ी का भी इससे परिचय कराया जा सकता है.
इस बारे में, नाटककार और निर्देशक दानिश इक़बाल कहते हैं कि किसी उपन्यास को पर्दे पर उतारना न सिर्फ मुश्किल होता है, बल्कि कई बार न्याय करना भी मुमकिन नहीं होता, ‘तभी तो गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने कभी अपने उपन्यास हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सीलिच्यूड पर फ़िल्म बनाने की इजाज़त नहीं दी.’
दानिश इक़बाल कहते हैं, “ख़ुद इब्ने सफ़ी ने धमाका नाम से एक फ़िल्म बनाई थी. लेकिन वो खुद भी इसे ऐसी नहीं बना पाए, जैसे उनके उपन्यास होते थे. फ़िल्म दरअसल एक अलग ही माध्यम है.”
लेकिन पत्रकार और इब्ने सफ़ी के मुरीद दिनेश श्रीनेत मानते हैं कि सिनेमा में बदलाव का दौर इसीलिए आया है कि लोगों ने अपने हालिया अतीत को खंगाला है.
उनके मुताबिक, “इंटरनेट जैसे माध्यमों पर इब्ने सफ़ी को ज़्यादा से ज़्यादा लाने की ज़रूरत है. मैं तो मानता हूं कि अगर शरलॉक होम्स पर गाय रिची इतनी शानदार फ़िल्म बना सकते हैं तो हमारे यहां कोई फ़िल्मकार इन उपन्यासों पर फ़िल्म क्यों नहीं बनाता?”
दानिश इक़बाल भी मानते हैं कि व्योमकेश बख़्शी जैसे किरदार पर पहले सीरियल और अब ज़ल्द आने वाली फ़िल्म के बाद शायद इब्ने सफ़ी पर भी फ़िल्मकारों की नजर जाए.
उर्दू के मशहूर शायर और आलोचक शम्सुरहमान फारूखी मानते हैं कि ‘इब्ने सफ़ी के किरदार इसलिए भी अपीलिंग लगते हैं, क्योंकि उन कमियों को पूरा करते हैं जो हम लोगों में हैं.’
दिनेश हिंदी या फिर अन्य भारतीय भाषाओं में इब्ने सफ़ी की लोकप्रियता की एक और वजह मानते हैं जिसे वो ‘बैलेंसिंग एक्ट’ कहते हैं.
वो कहते हैं, “उनके उपन्यासों में कहीं भी भारत या पाकिस्तान का जिक्र नहीं आता है. कई अन्य मुस्लिम देशों का हवाला ये कह कर दिया जाता है कि वो उनके देश के ख़िलाफ़ साजि़श कर रहे हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान का ज़िक्र नहीं.”
वो पैदा इलाहाबाद में हुए और अपने लेखन का सिलसिला वो भारत में ही कर चुके थे, लेकिन 1952 में वो पाकिस्तान चले गए.
बताते हैं कि उन्हें परेशानियों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन भारत को लेकर कभी उनमें कोई तल्खी नहीं रही.
भविष्य
भारत में उर्दू साहित्य गोष्ठी
इब्ने सफ़ी ने कराची में 26 जुलाई 1980 को 52 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया. तब से उर्दू अदब को और किसी इब्ने सफ़ी की तलाश है.
हालाँकि मज़हर कलीम अब भी इमरान सिरीज़ के उपन्यास लिखते हैं और उन्हें पढ़ने वालों की तादाद अच्छी-ख़ासी बताई जाती है.
उन्होंने कुछ नए किरदार भी इस सिरीज़ में जोड़े हैं, लेकिन इब्ने सफ़ी के प्रशंसक उनकी किताबों पर सिरीज़ की बुनियादी चीजों से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाते हैं.
शम्सुर्रहमान फारूकी उर्दू अदब में जासूसी विधा की मौजूदा हक़ीकत से वाकिफ़ है, लेकिन भविष्य को लेकर वो नाउम्मीद भी नहीं हैं.
वो कहते हैं, “इस वक़्त तो यही लगता है कि कुछ अच्छा नहीं लिखा जा रहा है. लेकिन इसमें कोई नियम या तर्क काम नहीं करता. जैसे इब्ने सफ़ी पैदा हो गए और उनके साथ कई लोग भी आ गए लिखने वाले, अच्छे या बुरे. अब वो सारा क़िस्सा खत्म हो गया.”
“लेकिन हो सकता है कि कल या परसों कोई नया आदमी पैदा हो जाए. जो लोगों के कल्पनालोक पर छा जाए, जैसे इब्ने सफ़ी छा गए थे.”

Citation
Ashok Kumar, “एक शख़्स के इर्द-गिर्द घूमती ‘जासूसी दुनिया’,” in BBC Hindi, March 15, 2015. Accessed on March 22, 2015, at: http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/03/150315_urdu_jasoosi_novels_pm

Disclaimer
The item above written by Ashok Kumar and published in BBC Hindi on March 15, 2015, is catalogued here in full by Faiz-e-Zabaan for non-profit educational purpose only. Faiz-e-Zabaan neither claims the ownership nor the authorship of this item. The link to the original source accessed on March 22, 2015, is available here. Faiz-e-Zabaan is not responsible for the content of the external websites.

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