उर्दू के नामवर शायर शैदा चीनी नहीं रहे

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पूरा नाम : लिन यंग वेन
कलमी नाम : शैदा चीनी
जन्मतिथि : 10 जून 1931, कोलकाता
मृत्यु : 8 मार्च 2015, जमशेदपुर
शायरी : वर्ष 1957 से
उस्ताद : बीजेड मायल
सम्मान : फिराक गोरखपुरी अवार्ड (अंजुमन तरक्की उर्दू हिंद-2003), तुलसी दास अवार्ड (हिन्दी साहित्य सम्मेलन), आजीवन सदस्यता बज्म-ए-अदब रांची कॉलेज।

उर्दू के नामवर शायर और दंत सर्जन लिन यंग वेन (शैदा चीनी) का रविवार सुबह टीएमएच में निधन हो गया। संत मेरीज चर्च बिष्टूपुर में सर्विस के बाद दोपहर में उनके पार्थिव शरीर को बेल्डीह कब्रगाह में सुपुर्दे खाक कर दिया गया। लंबे समय से सांस की समस्या से जूझ रहे 84 वर्षीय शैदा चीनी अपने पीछे पत्नी सियाओ एन लिन, पांच बेटियां और दो बेटों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं।

वायिलन भी बजाते थे
शैदा चीनी के पुत्र एवं दंत चिकित्सक डॉ. एरिक लियू ने बताया कि तीन वर्ष की उम्र में ही वर्ष 1934 में पिताजी लौहनगरी आए। उर्दू जुबान से दीवानगी की हद तक लगाव का आलम ये था कि उन्होंने मैट्रिक परीक्षा केएमपीएम स्कूल से उर्दू माध्यम से पास की। तब उस्ताद शायर बीजेड मायल के संपर्क में आकर शायरी करने लगे। पिताजी बचपन में हमें दोपहर में वायलिन बजाकर सुलाते थे। रात के अंधेरे में गुनगुनाते थे और टॉर्च जलाकर कागज पर लिखते थे।

लकीरों की सदा
शायर शम्स फरीदी ने बताया कि वर्ष 1957 से शायरी कर रहे शैदा चीनी का काव्य संग्रह, ‘लकीरों की सदा’ वर्ष 2009 में प्रकाशित हुआ। जिंदगी में उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद न वह कभी जीवन से और न ही इंसानियत से मायूस हुए। भारत पर चीन के आक्रामक रवैये और लौहनगरी में सांप्रदायिक दंगों से कुछ समय तक सदमे में रहे शैदा चीनी की कलम कभी थमी नहीं।

शैदा चीनी की कुछ पंक्तियां
शबनम बना दिया, कभी शोला बना दिया
मेरी नजर ने आप को क्या क्या बना दिया?
बीमार दिल ने तुमको मसीहा बना दिया
काबा को उसने गोया कलीसा बना दिया।
आज भी कानों में रस घोलती हैं।

Citation
Live Hindustan, “उर्दू के नामवर शायर शैदा चीनी नहीं रहे,” in Live Hindustan, March 8, 2015. Accessed on March 12, 2015, at: http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-Urdu-poet-Lin-Yang-Wen-TMH-died-39-39-473298.html

Disclaimer
The item above written by Live Hindustan and published in Live Hindustan on March 8, 2015, is catalogued here in full by Faiz-e-Zabaan for non-profit educational purpose only. Faiz-e-Zabaan neither claims the ownership nor the authorship of this item. The link to the original source accessed on March 12, 2015, is available here. Faiz-e-Zabaan is not responsible for the content of the external websites.

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