होली की बहारों के बेनज़ीर शायर

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कृष्ण प्रताप सिंह

भारत में नजीर नाम के शायरों में कम से कम दो बेनजीर हुए हैं। पहले नजीर अकबराबादी और दूसरे नजीर बनारसी। इनमें नजीर अकबराबादी को उर्दू नज्मों का जनक, साझे बिरसे का रौशन मीनार और आम आदमी के आम मसलों या कि अवाम का शायर कहा जाता है।

फिराक गोरखपुरी ने उन पर केंद्रित अपनी पुस्तक नजीर बानी में लिखा है कि हलचल से भरी दुनिया, आबादी की भीड़-भाड, घरों, मोहल्लों बाजारों व मेलों-ठेलों के शोरगुल से बिल्कुल दूर अपनी कल्पना के सुन्दर संसार में रहने वाले शायरों के विपरीत नजीर दुनिया के रंग में रंगे हुए महाकवि थे। वे दुनिया में और दुनिया उनमें रहती थी, जो उनकी कविताओं में हंसती-बोलती, जीती-जीगती, चलती-फिरती और त्योहार मनाती नजर आती है।
प्रसंगवश, होली नजीर का सबसे पसंदीदा त्योहार था, जिसे केंद्रित करके उन्होंने ग्यारह नज्में रची हैं, जिनमें यों तो सबकी सब अलग-अलग शीर्षक व रंग की हैं लेकिन तब देख बहारें होली की और जब खेली होली नंदललन तो अपना सानी ही नहीं रखतीं। इस कारण कई लोग उन्हें होली का यार शायर भी कहते हैं। उनकी रचनाओं में उनके समय का जीवन, हर स्तर, हर वर्ग, हर तरह, हर रंग, हर ढंग, हर अवस्था और हर स्थिति में इतने भरपूर ढंग से, अपनी पूरी गतिशीलता के साथ और इतने स्वाभाविक व सजीव रूप से चित्रित हुआ है कि भाषा, संस्कृति, सम्प्रदाय, जाति,धर्म आदि सब भेद मिट गये हैं। उन्हें अजान व शंख दोनों की आवाजों से एक जैसी मुहब्बत है और जहां वे आला दर्जे के साहित्यिक चित्रकार, आविष्कारी, आशावादी विचारक व दोस्त हैं, वहीं प्रकृति के अध्ययन के बादशाह भी हैं।
नजीर ने उर्दू शायरी को तब नज्म के मैदान में अंगड़ाइयां लेने का मौका दिया जब उसका दायरा आमतौर पर हुस्न व इश्क वाली गजलों के दामन तक ही सिमटा था। सच कहें तो उनके सारे साहित्य में हिन्दुस्तानी संस्कृति बोलती नजर आती है। उन्होंने होली पर नज्में कहीं, तो दीवाली और राखी को भी नजर ओट नहीं किया। कृष्ण के जन्म से लेकर शादी-ब्याह तक उनकी चार नज्में हैं तो एक उनकी बांसुरी पर भी है। उन्होंने हजरत सलीम चिश्ती और ताजगंज के रोजे पर नज्में लिखीं तो हरि की प्रशंसा, भैरव की प्रशंसा, महादेव का ब्याह, नरसी अवतार और बलदेव जी का मेला पर भी, जिनमें हिन्दू धर्म और उसके रीति-रिवाजों को बहुत बारीकी से पेश किया। नजीर के अपने लोक से जुड़ाव का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि उनके न रहने के पौने दो सौ साल बाद भी वृन्दावन के मन्दिरों में उनके गीत भजनों की तरह गाये जाते हैं।
प्रोफसर अली अहमद फात्मी की मानें तो नजीर ने कृष्ण, महादेव, बलदेव, होली व दीवाली आदि पर इस तरह की अवामी, जानदार और यादगार नज्में न कही होतीं तो इकबाल को राम और हसरत को कृष्ण समझने में देर लग जाती। उनके जन्म की तिथि व स्थान को लेकर जानकारों में एक राय नहीं हैं। कुछ कहते हैं कि वे 1735 में आगरा में मोहम्मद फारूक के बेटे के रूप में पैदा हुए, उनकी मां आगरा के किले के गवर्नर नवाब सुल्तान खां की बेटी थीं और उनका बचपन का नाम वली मोहम्मद था। लेकिन कई अन्य का दावा है कि वे दिल्ली में जन्मे और अभी छोटे बच्चे ही थे कि दिल्ली को नादिरशाह के हमले व कत्ल- ए-आम से सिहरती देखने को मजबूर हुए। जब तक वह संभलती, उस पर अहमदशाह अब्दाली ने चढ़ाई कर दी। इसके बाद बेफिक्र होकर जीने के लिए नजीर अपनी मां और नानी के साथ आगरा में मिठाई वाले पुल के पास जा बसे और जल्दी ही वहां की सभ्यता व संस्कृति के उस रंग में रंग गये जिसमें हिन्दुओं व मुसलमानों में किसी परायेपन की गुंजायश नहीं थी। तभी उनके साहित्य में आगरा की आम जिन्दगी की तफसीलें पूरी झमक व ठाठ के साथ उपस्थित हैं।
कहा जाता है कि वे जिस भी मजलिस में बैठते, शिष्टाचार के चिराग मालूम होते। हां, अधेड़ होते-होते उन्होंने शादी कर ली थी और मोरी दरवाजे के पास एक छोटे से घर में रहने लगे थे। एक बार नवाब वाजिद अली शाह ने उन्हें अपने दरबार में यानी लखनऊ बुलाया और इनकार न कर सके, इसके लिए ढेर सारे रुपये भिजवा दिये। उतने रुपये देखकर नजीर बेचैन से हो उठे और उन्हें सारी रात नींद नहीं आई। परेशान होकर सुबह उन्होंने एक कड़वा फैसला किया : जाने से मना कर दिया और सारे रुपये ठुकरा दिये। कह दिया कि अदना ताल्लुक से इतने तरद्दुद हैं, जब पूरा ताल्लुक होगा, तो खुदा जाने क्या हाल हो!
ऊपर वाले ने उन्हें लम्बी उम्र अता करने में भी कोई कोताही नहीं की थी। अलबत्ता, 95 साल की उम्र में उन पर फालिज का हमला हुआ तो वह जान लेकर ही माना। 16 अगस्त, 1830 को उन्होंने आखिरी सांस ली तो जनाजे में हजारों हिन्दू-मुसलमान शामिल हुए। उन्हें उनके मकान में ही दफन किया गया। आगरा के ताजगंज में अभी भी वसंत पंचमी के दिन नजीर मेला लगता है जिसमें हिन्दू-मुसलमान कहें या आम मेहनतकश लोग मिलकर उनकी मजार पर फूल चढ़ाते और जीवन के उत्सव व उल्लास से भरी उनकी नज्में गाते हैं।

Citation
Krishna Pratap Singh, “होली की बहारों के बेनज़ीर शायर,” in Dainik Tribune, March 5, 2015. Accessed on March 12, 2015, at: http://dainiktribuneonline.com/2015/03/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A5%80%E0%A4%B0/

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The item above written by Krishna Pratap Singh and published in Dainik Tribune on March 5, 2015, is catalogued here in full by Faiz-e-Zabaan for non-profit educational purpose only. Faiz-e-Zabaan neither claims the ownership nor the authorship of this item. The link to the original source accessed on March 12, 2015, is available here. Faiz-e-Zabaan is not responsible for the content of the external websites.

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